देखो आज मेरे करो में रवि चल कर आया है
मेरे अंतर्मन के तम को नष्ट कर उजियारा लाया है,
देखो आज मेरे करो में रवि चलकर आया है,
तेरे आने से नव-जीवन का हो रहा आगाज़,
तू आया तो हुआ सब ओर उजाला,
खग-विहग सब चहक उठे,
तू खुद तप कर धरा को रोशन करता है,
घर-आंगन अपनी आभा फैलाता है,
तुझसे ही तो सीखा है ,संघर्ष करना मैंने,
तुझे काले मेघों की ओट में निस्तेज होते देखा मैंने,
मौसम की प्रवृत्ति को झेलकर ,उससे बाहर आते देखा मैंने,
तुम्हारे ताप को महसूस किया मैंने,
तुम्हारी आभा से दुनिया को आह्लादित होते देखा मैंने,
भोर को तुम से ही होते देखा मैंने,
देते नव-जीवन सर्वस्व, भर दो आभा मेरे जीवन में भी,
तुमसे प्रेरित हो मैं भी कुछ नया कर पाऊं,
दे दो थोड़ा सा अंश मुझे भी अपना, इस जीवन में कुछ कर जाऊं।
निर्बल, दीन-दुखियों के जीवन में ,तुम सा उजाला फैलाऊं।
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डॉ. ऋतु नागर
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