दातुन का प्रयोग क्यों है जरूरी

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आयुर्वेद के अनुसार गूलर, नीम, कीकर यानी बबूल, वज्रदंती आदि के पेड़ों की टहनियों का दातुन करना चाहिये। नीम एक ऐसा वृक्ष है, जिसके जड़, तने, पत्तियों, टहनियों और छालों में औषधिक गुण मौजूद है। देश-विदेश में इसे लेकर तमाम अनुसंधान हुए हैं और हो भी रहे हैं। वैसे आज के दौर में टूथब्रश का प्रचलन बढ़ गया है, लेकिन टूथब्रश हमे प्रकृति से दूर करते हैं, जबकि दातुन का प्रयोग हमे प्रकृति के नजदीक ले जाता है। वैसे जो लोग टूथ ब्रश इस्तेमाल करते हैं, उन्हें सलाह है कि उन्हें हर सप्ताह ब्रश को बदल लेना चाहिए या उन्हें अच्छी तरह से स्वच्छ कर लेना चाहिए। अधिक दिनों तक एक ही ब्रश का इस्तेमाल नुकसानदायक होता है।

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सबसे पहले बात करते हैं, नीम के दातुन की। नीम के दातुन के प्रयोग के अनेकानेक लाभ होते हैं। सबसे पहला फायदा तो यह है कि इससे दांतों की सफाई बहुत ही अच्छी होती है। पायरिया जैसे रोग नहीं होते हैं। नीम के दातुन के दौरान जो रस पेट में जाता है, उससे आंत में होने वाली कृमि यानी कीड़ों का नाश होता है। गैस, अपच आदि समस्याओं के निराकरण में नीम का दातुन अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होते हैं। गूलर के दातुन से जुबान की लड़खड़ाहट दूर होती है।

गूलर के दातुन से जीभ का कालापन, हकलाना और लडखड़ाना दूर होता है। बेर के दातुन के लाभ अब आपको बताते हैं। बेर के दातुन से दांतों की सफाई तो नि:संदेह ंअच्छी होती है, विश्ोषतौर पर जो लोग गले में मधुरता लाना चाहते हैं, उन्हें नियमित रूप बेर के दातुन का प्रयोग करना चाहिए। वज्रदंती का प्रयोग दांतों को मजबूती प्रदान करता है। इसके प्रयोग से दांतों की जड़े मजबूत होती है।

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