मुक्तिदाता शिव की विवाह गाथा

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भगवान शिव मुक्तिदाता है। वह निराकार भी है और साकार भी है। उन अविनाशी शिव के ध्यान मात्र से मनुष्य का कल्याण सम्भव है। वह आदि पुरुष ही ध्यान से सुलभ है। सजह भाव से ध्यान व पूजन करने से प्रसन्न होने वाले हैं। शास्त्रों मे ब्रह्मा आदि, मुक्ति प्रदान करने वाले न हो कर केवल महादेव को ही मुक्ति प्रदान करने वाला कहा गया हैं। ब्रह्मा आदि त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ, काम ) देने वाले हैं, जबकि महादेव तो निर्विकार, परब्रह्म, तुरीय, प्रकृति, त्रिगुणों से परे हैं। ज्ञानरूप, ज्ञानगम्य, अव्यय, साक्षी, त्रिवर्ग देने वाले के साथ ही पांचवी मुक्ति कैवल्य मुक्ति भी प्रदान करने वाले महादेव ही हैं।

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सांसारिक दुखो का नाश करने वाली, आनन्द देने वाली मुक्ति चार प्रकार की कही गयी है। 1- सारूप्य, 2- सालोक्य,3- सान्निध्य व 4- सायुज्य । यह सारा जगत जिसके द्बारा पालित होता है और अन्त में जिसमे लीन हो जाता है वही ‘ शिव का स्वरूप ‘ कहा जाता है – वही सकल और निष्कल दो रूपों मे वेदों में वर्णित है। विष्णु, ब्रह्मा, सनत्कुमार, शुकदेव आदि सभी देवता उस रूप को न जान पाये।

सत्यं ज्ञानमनन्तं च सच्चिदानन्दसंज्ञितम् । निर्गुणो निरुपाधिश्चाव्यय: शुद्धो निरंजन: ।।
न रक्तो नैव पीतश्च न श्वेतो नील एव च । न ह्रस्वो न दीर्धश्च न स्थूल: सूक्ष्म एव च् ।।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । तदेव परमं प्रोक्तं ब्रह्मैव शिवसंज्ञकम् ।।
आकाशं व्यापकं यद्वत्तथैव व्यापकं त्विदम् । मायातीतं परात्मानं द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ।।
तत्प्राप्तिश्च भवेदत्र शिवज्ञानोदयाद् ध्रुवम् । भजनाद्वा शिवस्यैव सूक्ष्मत्मया सतां द्विजा: ।।

भावार्थ- वह सत्य , ज्ञानरूप , अनन्त , सत्-चित्-आनन्दस्वरूप , निर्गुण , उपाधिरहित , अव्यय , शुद्ध एवं निरंजन है । वह न रक्त है , न पीत है , और न ही श्वेत और न ही नील है , न छोटा न बडा – न स्थूल और न ही सूक्ष्म है ।
मन सहित वाणी आदि इन्द्रियां जिसे बिना प्राप्त किये ही लौट आती हैं, वही परब्रह्म ‘ शिव ‘ नाम से कहा गया है । जिस प्रकार आकाश व्यापक है उसी प्रकार यह ( शिवतत्त्व ) भी व्यापक है । यह माया से परे परात्मा द्वन्द्वरहित तथा मत्सरशून्य है – जिसकी प्राप्ति शिवविषयक ज्ञान के उदय से , शिव के भजन से अथवा सज्जनों के सूक्ष्म विचार से होती है।
मुक्ति ( मोक्ष ) प्रदायक महादेव – भजन के अधीन हैं , इस लोक मे ज्ञान का उदय तो अत्यन्त दुष्कर है परंतु भजन सरल कहा गया है , इसलिये मुक्ति के लिये भजन श्रेयस्कर है । प्रेम की उत्पत्ति के लक्षण वाली भक्ति , कृपा प्रसाद से अवश्य ही सुलभ होती है ।

ऐसे महादेव के विवाह के प्रसंग के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं, जिसको श्रद्धाभाव से पढ़ने-सुनने से जीव का कल्याण ही होता है। प्रजापति दक्ष ने जब भगवान शंकर का अपमान किया, तब सती ने देह का त्याग कर दिया था। इसके बाद सती-विरह में भगवान शंकर जी की विचित्र दशा हो गयी। वे दिन रात सती का ही ध्यान करते और उसी की चर्चा करते। सती ने भी देहत्याग करते समय यही संकल्प किया था कि मैं पर्वतराज हिमालयके यहाँ जन्म ग्रहण कर फिर से शंकर जी की अद्धांगनी बनूंगी। भला जगदम्बा का संकल्प कहीं अन्यथा हो सकता है? वे काल पाकर हिमालय की पत्री मैना के गर्भ प्रविष्ट हुई और यथा समय उनको कोख में से प्रकट हुई। पर्वतराजकी दुहिता होने के कारण वे ‘ पार्वती ‘ कहलायी। जब वे कुछ सपानी हुई तो उनके माता – पिता को उनके अनुरूप वर तलाश करने की फिक्र पड़ी।

एक दिन अकस्मात देवर्षि नारद पर्वतराजके भवन में आ पहुंचे और कन्या को देखकर कहने लगे कि इसका विवाह भगवान शंकर जी के साथ होना चाहिये, वही इसके योग्य है। यह जानकर की साक्षात जगन्मता सती हो उनके यहाँ प्रकट हुई है, पार्वती के माता – पिता के आनंद का ठिकाना न रहा । ये मन ही मन अपने भाग्यकी सराहना करने लगे। एक दिन अकस्मात भगवान शंकर जी सती – विरह में व्याकुल, घूमते- घूमते उसी प्रदेश में जा पहुँचे और पास ही गंगावतरण स्थान में तपस्या करने लगे। हिमालय को जब इस बात का पता लगा तो वे अपनी पुत्री को साथ लेकर शिव जी के पास पहुंचे और अनुनयपूर्वक अपनी पुत्री को सेवा ग्रहण करने की प्रार्थना की। शिव जी ने पहले तो उनकी सेवा स्वीकार करने में आनाकानी की, लेकिन पीछे पार्वती की अनुपम भक्ति देखकर उनका आग्रह न टाल सके। अब तो पार्वती प्रतिदिन अपनी सखियों को साथ से शंकर जी की सेवा में उपस्थित होने लगी। वह उनके बैठने के स्थान झाड़ू – बहार कर साफ कर देती और किसी भी प्रकार का कष्ट न हो, सदा ही इस बात का ध्यान रखती । वे नित्यप्रति उनके चरण धोकर चरणोदक ग्रहण करती और षड्शोपचार में उनकी पूजा करतीं। इस तरह पार्वती को लेकर भगवान शंकर की सेवा करते सुदीर्घ काल व्यतीत हो गया। लेकिन पार्वती जैसी त्रिभुवनसुन्दरी पूर्ण यौवना बाला से इस प्रकार एकांत में सेवा लेते रहने पर भी भगवान शंकर के मन की विकार नहीं हुआ । वे सदा आत्मरमण करते हुए समाधिमे निश्चल रहते।

देवताओं का तारक नाम का एक असुर बहुत त्रास देने लगा। यह जानकर की भगवान शंकर जी के पुत्र से ही उसकी मृत्य सकती है। शिव – पार्वतीका विवाह कराने की चेष्टा करने लगे। उन्होंने भगवान शिव को पार्वती जी के प्रति अनुरक्त करने के लिए कामदेव को सिखा – पढ़ाकर उनका पासा भेजा, लेकिन पुष्पायुध का पुष्पवाण भी भगवान शंकर जी के मन को विक्षुब्ध न कर सका। उलटे वह भगवान की क्रोधाग्नि से भस्म हो गया। भगवान शंकर भी वहां अधिक रहना अपनी तपश्चर्या के लिए अंतरायरूप समझकर कैलास की ओर चल दिए। पार्वती जी को शंकर जी की सेवा से वंचित होने का बहुत दुख हुआ, लेकिन उन्होंने निराश न होकर अपकी बार तप के द्बारा भगवान शंकर को प्रसन्न करने की ठानी। उनकी माता ने उन्हें सुकुमार एवं तप के अयोग्य समझ कर बहुत मना किया, इसलिए उनका उमा- उ+मा(तप न करो)। यह नाम प्रसिद्ध हुआ, लेकिन पार्वती अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे तपस्या के लिए घर के निकल पड़ी और जहां शिव जी ने तपस्या की थी, उसी शिखर पर तपस्य करने लगीं। तभी से लोग उस शिखर को ‘ गोरी – शिखा ‘ कहने लगे। वहां उन्होंने पहले वर्ष फलाहारसे जीवन व्यतीत किया, दूसरे वर्ष में पर्ण (वृक्षों के पत्ते ) खाकर रहने लगीं। फिर तो उन्होंने पर्ण का भी त्याग कर दिया, इसीलिये अपर्णा कहलायी । इस तरह उन्होंने तीन हजार वर्ष तक घोर तपस्या की।

उनकी कठोर तपश्चर्या को देखकर बड़े – बड़े ऋषि – मुनि भी दंग रह गये। अंत में भगवान आशुतोष का आसन हिला। उन्होंने पार्वती की परीक्षा के लिये पहले सप्तऋषियों को भेजा और पीठ स्वयं बटुवेश धारणकर पार्वती की परीक्षाके निमित्त प्रस्थान किया। जब उन्होंने सब प्रकारसे जांच – परख कर देख लिया कि  माता पार्वतीजी की उनमें अविचल निष्ठा है, तब वे अपने को अधिक देर तक न छिपा सके। वे तुरन्त ही पार्वती के सामने अपने असली रूप में प्रकट हो गये और उन्हें पाणिग्रहणका वरदान देकर अन्तर्धान हो गये । माता पार्वती अपने तप को पूर्ण होते देख अपने घर लौट आयीं और अपने माता – पिता से शंकर जी के प्रकट होने और वरदान देने का सारा वृत्तांत कह सुनाया। अपनी एकमात्र दुलारी पुत्री की कठोर तपश्चर्या को फालोन्मुख देखकर माता – पिताके आनन्द का पार नहीं रहा। पीछे से शंकर जी ने सप्तऋषियों को विवाह का प्रस्ताव लेकर हिमालप के पास भेजा और इस तरह विवाह की शुभ तिथि निश्चित हुई। शिव जी ने नारदजी के द्बारा सारे देवताओं को विवाह में सम्मिलित होने के लिये आदरपूर्वक निमंत्रित किया और निश्चित तिथि को ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र प्रभृत सारे प्रमुख देवता अपने-अपने दल-बल समेत कैलाश पर पधारे। उधर, हिमालयराज ने विवाह के लिये बड़ी धूमधाम तैयारियों की और शुभ लग्न में शिवजी की बारात हिमालयके द्बार पर आ लगी।

पहले तो शिवजी का विकट रूप तथा उनके भूत प्रेतादि को देखकर मैना डर गयीं और पर अपनी कन्या का पाणिग्रहण कराने में अनाकानी करने लगीं। पीछे से जब उन्होंने शंकर जी का करोड़ों कामदेवों को लजाने वाला सोलह वर्ष की अवस्था का परमलावण्यमय रूप देखा तो वे देह-गेह की सुधि भूल गईं और शंकर पर अपनी कन्या के साथ-साथ अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर दिया। हर- गौरी का शुभ विवाह आनंदपूर्वक सम्पन्न हुआ। हिमाचल ने बड़े चाव से कन्यादान दिया। भगवान विष्णु और अन्य देवताओं ने नाना प्रकार के उपहार भेंट दिए। ब्रह्मा जी वे वेदोक्त रीति से विवाह सम्पन्न कराया। सभी लोग अमित उछाह से भरे अपने-अपने स्थान को लौट गए। शिव विवाह का यह पावन प्रसंग परम आनंद प्रदान करने वाला है। इस प्रसंग में भगवान शिव की लौकिक लीलाओं को दर्शाया गया है।

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