सम्मेद शिखर-जैन मंदिर: शिखर को ‘ पार्श्वनाथ शिखर ‘ भी कहते हैं

0
1019
सम्मेद शिखर

sammed shikhar: shikhar ko paarshvanaath shikhar bhee kahate hainसम्मेद शिखर : जैनधर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थ सम्मेद शिखर झारखंड प्रदेश के हजारीबाग क्षेत्र में स्थित है। तीर्थकर पार्श्वनाथ का यहां परिनिर्वाण हुआ था, उनके नाम पर इस शिखर को ‘ पार्श्वनाथ शिखर ‘ भी कहते हैं। तीर्थकर पार्श्वनाथ का समय 877 ई.पू. से 777 ई.पू. तक माना जाता है। संपूर्ण तीर्थ क्षेत्रों में सर्वप्रमुख होने के कारण यह ‘ तीर्थराज ‘ कहलाता है। जैनधर्म के सभी तीर्थंकर परंपरागत रूप से अयोध्या में जन्म लेते रहे और सभी ने सम्मेद शिखर पर आकर ही मोक्ष प्राप्त किया। सम्मेद शिखर में मुख्य तौर पर तीन धार्मिक परिवेशों के दर्शन होते हैं, जो क्रमश : ‘ तेरापंथी कोठी ‘, ‘ मझली कोठी ‘ और ‘ बीसपंथी कोठी ‘ कहलाते हैं। तेरापंथी कोठी में भगवान पद्मनाथ की भव्य प्रतिमा शोभायमान है। इस कोठी में मुख्य मंदिर में तेरह वीथियां हैं। ये सभी स्वतंत्र जैनमंदिर हैं तथा इनके ऊपर आकर्षक शिखर बने हुए हैं। इन मंदिरों में कुल मिलाकर 379 मूर्तियां स्थापित हैं। यहां विभिन्न अवसरों पर भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति की रथ यात्रा निकाली जाती है। मझली कोठी में भी अनेक मंदिर और सुंदर मूर्तियां हैं। सबसे प्राचीन बीसपंथी कोठी है, जिसके मुख्य मंदिर में आठ जिनालय हैं, जिनके भव्य और आकर्षक शिखर देखते ही बनते हैं। इस कोठी के 24 तीर्थकरों की मूर्तियां विराजमान हैं।

सम्मेद शिखर में जगह – जगह तीर्थंकरों और जैनमुनियों के स्मृति – चिह्न बने हुए हैं, जिन्हें टोंक कहा जाता है। निर्वाण के स्थानों पर बने स्मृति – चिह्नों और मंदिरों के दर्शनों के लिए ही भक्तिभाव से लोग जाते हैं। सिंह जैसे हिंसक प्राणियों का पार्श्वनाथ पर्वत पर स्वच्छंद घूमना और उससे किसी को कोई हानि नहीं पहुंचना, इस तीर्थराज की महिमा का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है। शिखर की यात्रा हर समय चलती रहती है। श्रद्धालु पर्वत के भक्तिभावनापूर्ण वातावरण में पहुंचकर अपना जीवन धन्य मानते हैं। यहां मुख्य दर्शनीय स्थलों की संख्या लगभग पच्चीस है। जैन धर्मावलंबियों में यह मान्यता है कि सम्मेदशिखर की तीर्थयात्रा से मोक्ष प्राप्त होता है। अन्य विचारधारा के लोग भी प्राय यहां आकर भारतीय – संस्कृति के अग्रदूतों की स्मृति में अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते रहते हैं। जैनधर्म के अहिंसा के सिद्धांत के तहत इस तीर्थ के पार्श्वनाथ पर्वत की परिधि में किसी प्रकार की जीवहिंसा वर्जित है। सम्मेदशिखर का पहाडी मार्ग करीब 10 किलोमीटर लंबा है। इसमें 2 किलोमीटर तक मोटरें जाती हैं। शेष यात्रा पैदल की जाती है। सम्मेद शिखर की यात्रा के लिए पारसनाथ हिल नामक स्टेशन या गिरीडीह स्टेशन पर उतरते हैं। शिखर तक जाने के दो मार्ग हैं – एक मधुपुर की ओर से और दूसरा नीमिया घाट होकर। मधुपुर जाना सुविधाजनक रहता है।

Advertisment

चांपानेर ( पावागढ़ ): जैन मंदिर,पावागढ़ कभी गुजरात की राजधानी था

सनातन धर्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत है, ऐसे मे वैदिक ज्ञान के अतुल्य भंडार को जन-जन पहुंचाने के लिए धन बल व जन बल की आवश्यकता होती है, चूंकि हम किसी प्रकार के कॉरपोरेट व सरकार के दबाव या सहयोग से मुक्त हैं, ऐसे में आवश्यक है कि आप सब के छोटे-छोटे सहयोग के जरिये हम इस साहसी व पुनीत कार्य को मूर्त रूप दे सकें। सनातन जन डॉट कॉम में आर्थिक सहयोग करके सनातन धर्म के प्रसार में सहयोग करें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here