के. तिवारी, लख़नऊ । भारतीय संस्कृति और सर्वोच्च आदर्शो की जननी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण में नाथ संप्रदाय गोरक्षपीठ की तीन-तीन पीढ़ियों का सक्रिय योगदान रहा है। श्रीराम जन्मभूमि मामले में जब भी कोई महत्वपूर्ण घटना घटी, उसका सीधा नाता नाथ पीठ से जरूर रहा।
राम मंदिर आंदोलन में सर्वप्रथम नाथ संप्रदाय के गोरक्षपीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1934 से 1949 तक राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व किया। उनके बाद ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज ने राम मंदिर आंदोलन को नई दिशा और गति दी। वर्तमान में राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या के कायाकल्प का बीड़ा गोरक्षपीठाधश्वर योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने उठाया है। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पर श्रीगोरक्षपीठ के योगदान पर एक नजर-
गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज
श्रीराम जन्मभूमि मामले में जब भी कोई महत्वपूर्ण घटना घटी, उसका सीधा नाता नाथपीठ से जरूर रहा। 22-23 दिसंबर 1949 को जब श्रीराम जन्मभूमि में रामलला का प्रकटीकरण हुआ। उस समय गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज साधु-संतों के साथ वहां संकीर्तन कर रहे थे। बाबा अभिरामदासजी के साथ महन्त दिग्विजयनाथजी ने रामलला की मूर्ति को वहां तक पहुंचाया।
अक्टूबर 1949 में वेदान्ती रामपदार्थदास जी की अध्यक्षता में मानस यज्ञ प्रारम्भ हुआ। पाठ-समाप्ति के दिन आयोजित सभा में अखिल भारतीय धर्म-संघ के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी, उत्तर प्रदेश हिन्दू-महासभा के अध्यक्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज ने सक्रिय भाग लिया। इस महासभा में राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए संकल्प लिया गया।
गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्री अवेद्यनाथ जी महाराज
महन्त दिग्विजयनाथजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद महन्त अवेद्यनाथजी महाराज ने राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाली और फिर राम जन्मभूमि मुक्त यज्ञ समिति बनी। इसकी पहली यात्रा महन्त अवेद्यनाथजी महाराज की अगुवाई में बिहार के सीतामढ़ी से अयोध्या तक निकाली गई। महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज के अगुवाई में ही 1984 में राम जन्मभूमि न्यास का गठन हुआ। वह न्यास के पहले अध्यक्ष चुने गए।
18 जून 1984 को लक्ष्मण किला, अयोध्या में संत-महात्माओं एवं विश्व हिन्दू परिषद की बैठक संपन्न हुई। श्रीगोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज के संयोजकत्व में सबसे पहले श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए एक समिति गठित करने का निश्चय किया गया।
21 जुलाई 1984 को बाल्मिकि भवन अयोध्या में (श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति) का विधिवत गठन किया गया। इस समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज जी बनें। उपाध्यक्ष महंत श्रीराचन्ददास जी और श्री नृत्यगोपालदास जी बनें।
31 अक्टूबर और 01 नवम्बर 1985 को धर्म संसद का द्वितीय अधिवेशन उडुपी में संपन्न हुआ, जिसमें निर्णय लिया गया कि 08 मार्च 1986 तक श्रीराम जन्मभूमि का ताला नहीं खोला गया, तो सम्पूर्ण देश के हजारों धर्माचार्य 09 मार्च से सत्याग्रह करेंगे। धर्म संसद में इस सत्याग्रह के संचालन के लिए महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज को अखिल भारतीय संयोजक नियुक्त किया गया।
01 अप्रैल 1986 को अखिल भारतीय नाथ संप्रदाय तथा श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने नागौर (राजस्थान) में विशाल जनसमुदाय को सम्बोधित करते हुए कहा, कि जब तक हिन्दू समाज को श्रीराम जन्मभूमि पूर्णरूपेण नहीं सौंपी जाती तथा विश्वनाथ मंदिर वाराणसी और श्रीकृष्ण जन्मस्थली मथुरा पूर्णतः मुक्त नहीं होती, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।
18 मार्च 1987 को महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने वाराणसी में आयोजित सार्वजनिक सभा में स्पष्ट कहा कि भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या, भगवान शिव का प्राकट्य स्थल, ज्ञानवापी एवं श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा हिन्दुओं को वापस किये बिना राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता का आधार कायम नहीं किया जा सकता।
लोकसभा में एक अप्रैल 1987 को बाबरी मस्जिद के समले पर तीखीं झड़प पर 2 अप्रैल 1987 को महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने गोरखपुर में कहा कि जो बाबरी मस्जिद को राष्ट्रीय स्मारक बनाने का सुझाव दिया जा रहा है, वह स्मारक राष्ट्रीय नहीं बल्कि गुलामी का प्रतीक होगा। मन्दिर-मस्जिद तो हटाये जा सकते हैं, किन्तु किसी का जन्म स्थान हटाया नहीं जा सकता।
05 अप्रैल 1987 को पवित्र सरयू के तट पर विशाल जन-समूह ने खड़े होकर प्रतिज्ञा ली, कि हम श्रीरामलला की मूर्ति नहीं हटने देंगे और इसके लिए कुर्बानी देकर इस स्थान पर भव्य मन्दिर का निर्माण कराएंगे। इस अवसर पर पांच प्रस्ताव पास किये गये। जिनमें कहा गया कि श्रीराम जन्मभूमि ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर निश्चित रूप से हिन्दू-मन्दिर है। महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने अपने सम्भाषण में कहा कि श्रीराम जन्मभूमि को राष्ट्रीय-स्मारक बनाने का सुझाव बेबुनियाद और हास्यास्पद है। मुसलमानों की जितनी आस्था काबा में है उससे कहीं अधिक बढ़कर हिन्दुओं की आस्था श्रीराम जन्मभूमि में है।
29 दिसम्बर 1987 को बाबरी मस्जिद एक्षन कमेटी के प्रान्तीय संयोजक जिलानी ने कहा कि यदि ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध हो जाए कि बाबरी-मस्जिद ही श्रीराम जन्मभूमि है, तो एक्षन कमेटी न केवल बाबरी-मस्जिद से अपने दावे को हटा लेगी, बल्कि आन्दोलन को स्थगित कर देगी। जन्मभूमि-मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने इसके प्रत्युत्तर में कहा कि जिलानी अपनी बात पर अटल रहें, सिद्ध हो जाएगा कि बाबरी-मस्जिद ही श्रीराम जन्मभूमि है।
26 जुलाई 1988 को श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज, विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय महामंत्री श्री अशोक सिंघल तथा प्रदेश महामंत्री श्री श्रीशचन्द्र दीक्षित ने संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए देश का राजनीतिक परिवर्तन करना पड़ेगा।
20 सितम्बर 1988 को महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने कहा कि अनेक प्रमाणों, शिलालेखों, कसौटी के खम्भों, बाबरनामा, कथित बाबरी मस्जिद के बगल में सीता-रसोई एवं श्रीरामचबूतरा से भलीभांति स्पष्ट हो गया है कि यह स्थान हिन्दुओं की श्रीराम जन्मभूमि ही है।
प्रयागराज में 30-31 जनवरी 1989 को संपन्न हुए धर्म संसद के तृतीय अधिवेशन एवं सन्त-महासम्मेलन में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने कहा कि मन्दिरों को तोड़कर मस्जिद बनाते समय, उनमें मन्दिरों के चिन्ह जान-बूझकर छोड़े गये, ताकि सदियों तक हिंदुओं की पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने को निरन्तर तिरस्कृत, हतोत्साहित और अपमानित अनुभव करती रहे।
गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी
महन्त अवेद्यनाथजी महाराज के ब्रह्मलीन होने के बाद श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या के कायाकल्प की जिम्मेदारी गोरक्षपीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संभाली। गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथजी महाराज ने राम मंदिर आंदोलन की लड़ाई लड़ते हुए इसे अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अब मुख्यमंत्री रहते हुए अयोध्या के कायाकल्प का भी बीड़ा उठाया है। ऐसे में राम मंदिर आंदोलन में नाथ संप्रदाय की भूमिका महत्वपूर्ण योगदान है। अयोध्या में जन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर 500 सालों से चल रहे संघर्ष का ऐतिहासिक फैसला जब आया, तो उस निर्णय को लागू करने के लिए मुख्यमंत्री के रूप में श्रीगोरक्षपीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ रहे।
रामलला के दर्शन करने से लेकर दीपोत्सव के रूप में अयोध्या के गौरव को लौटाने का प्रयास और सैकड़ों करोड़ की विकास योजनाओं, इंफ़्रा परियोजनाओं, राम की पैड़ी का उद्धार, नव्य अयोध्या के रूप में इक्ष्वाकुपुरी की परिकल्पना और उसे साकार करने संबंधी योजना पर पहल….आदि से स्पष्ट होता है कि मुख्यमंत्री अयोध्या का कायकल्प कर त्रेतायुग का गौरव लौटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद वह लगभग 18-19 बार अयोध्या गए। पिछले तीन भव्य दीपोत्सवों के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी ने अयोध्या को न केवल एक नई पहचान दी बल्कि उसे पूरी दुनिया में स्थापित भारतवंशियों के हृदयों से जोड़ा और अयोध्या को उसका वैश्विक गौरव फिर से लौटाने का कार्य किया। फैजाबाद जनपद का नाम अयोध्या करके जन भावनाओं को मूर्तरूप दिया। मुख्यमंत्री जिस तरह से अयोध्या का विकास कर , उसका कायाकल्प करने के प्रति प्रतिबद्ध हैं उससे लग रहा है कि अयोध्या जल्द ही त्रेतायुग का वही रूप धारण करेगी जिसका वर्णन पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है। और फिर तुलसी के ये शब्द साकार रूप ग्रहण करेंगे-
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज।
सहस शेष नहीं कहि सकईं जहँ नृप राम बिराज।।
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